*राजनैतिक व्यंग्य-समागम*
*1. कड़ी कार्रवाई : विष्णु नागर*
इस देश में 'कड़ी कार्रवाई' का बड़ा चक्कर है। जब देखो, तब कड़ी कार्रवाई होने लगती है। कभी भी सीधी-सिंपल कार्रवाई नहीं होती! कुछ भी ऐसा या वैसा हुआ -- और ऊपरवाले की किरपा से लगभग हर रोज़ होता रहता है -- तो फौरन 'कड़ी कार्रवाई' होना शुरू हो जाती है। राम मंदिर में 200 करोड़ की डकैती हुई, तो इस मामले में भी 'कड़ी कार्रवाई' ही होगी। जैसा कि चलन है, आदित्यनाथ जी ने भी कह दिया है कि कोई कितने ही बड़े पद पर हो, दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। कोई आश्चर्य नहीं कि कड़ी से कड़ी कार्रवाई भी हो जाए, बल्कि कड़ी से कड़ी से कड़ी कार्रवाई होने की आशंकाएं हैं, क्योंकि मामला उत्तर प्रदेश का है, उसमें भी अयोध्या का है और अयोध्या में भी राम मंदिर का है और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ हैं, जो कड़ी से कम कार्रवाई करते नहीं, बल्कि अकसर कड़ी से कड़ी कार्रवाई कर डालते हैं, बल्कि कभी-कभी तो कड़ी से भी कड़ी और उससे भी कड़ी कार्रवाई करके ही मानते हैं, मगर लोगों को इसका पता उनके भारी-भरकम बयानों से चलता है!यही उनकी मुख्य विशेषता है। इसी कारण उत्तर प्रदेश चल रहा है, वरना कभी का बैठ चुका होता!
राममंदिर मामले में कड़ी से कड़ी और उससे भी कड़ी कार्रवाई हुई, तो भी ईडी-सीबीआई बीच मे नहीं आएगी और न उसे आने दिया जाएगा। कहीं बुलडोजर नहीं चलेगा, किसी का फुल या हाफ एनकाउंटर नहीं होगा। सब शांतिपूर्वक होगा, लेकिन कार्रवाई तो साहब, कड़ी से कड़ी ही होगी! बस उसमें बड़ा से बड़ा कोई नहीं फंसेगा और यह कहने की बात नहीं कि उसमें छोटा से छोटा, बल्कि उससे भी छोटा फंसेगा। चांस इसके ज्यादा हैं कि कोई नहीं फंसेगा, उल्टे आरोप लगाने वाले फंस जाएंगे, क्योंकि मामला राममंदिर का है, मुख्यमंत्री आदित्यनाथ हैं और चुनाव बहुत दूर नहीं हैं! उन्हें मंदिर में की गई यह डकैती अभी से अफवाह लगने लगी है, भक्तों की भावनाएं आहत करने की कोशिश लगने लगी है, अयोध्या को बदनाम करने की साज़िश लगने लगी है, तो आप समझ लीजिए, एसआईटी बेचारी क्या करेगी? मुख्यमंत्री जी की भावनाओं का सम्मान करके जयश्री राम करते हुए बैठ जाएगी!
उधर प्रधानमंत्री के खासमखास नृपेंद्र मिश्र इसे डकैती और विश्वासघात बता रहे हैं। मतलब दिल्ली और लखनऊ में अंदर ही अंदर रस्साकशी चल रही है।
दिल्ली में प्रदूषण बढ़ रहा है, चिंता न करें, नियम तोड़ने वालों पर कड़ी कार्रवाई होगी। इंडिगो की लापरवाही के कारण हजारों हवाई यात्री परेशान हुए, कड़ी कार्रवाई होगी। खाद की कालाबाजारी करनेवालों पर कड़ी कार्रवाई होगी। नकली दवाई सप्लाई करने वालों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई होगी। गैंगस्टर को अपना आइकन माननेवालों पर कड़ी कार्रवाई होगी। स्कूल के कमरे गिर गए, बच्चे मर गए, चिंता न करें, कड़ी कार्रवाई होगी। मंदिर जाते या आते समय या प्रवचन के बाद लोग मारे गए, कड़ी कार्रवाई होगी। अस्पताल में लापरवाही से लोग मर गए, कड़ी कार्रवाई होगी। मतलब सब कड़ी कार्रवाई के पीछे पड़ गए हैं!
पहले वाले भी कड़ी कार्रवाई करते थे। ये भी यही करते हैं और आगे आने वाले भी, मेरा दृढ़ मत है कि यही करेंगे, क्योंकि इस देश में कड़ी कार्रवाई करने की परंपरा 'भगवान श्री राम' के समय से चली आ रही है। यहां कार्रवाई चूंकि कड़ी होती है, इसीलिए यहां राम राज्य स्थापित हो चुका है और हिन्दू राष्ट्र स्थापित होने वाला है! डंका बजाने वाले को जब भी विदेश यात्राओं से लंबी फुर्सत मिलेगी, डंका बज जाएगा!
आजादी के बाद से आज तक कम से कम पांच करोड़ बार हिंदुस्तान के हर कोने में हर मामले में कड़ी कार्रवाई हो चुकी है और अभी भी जारी है, इसलिए यह आंकड़ा जल्दी ही बढ़कर छह करोड़ तक जा सकता है। आजकल चूंकि सरकार ने अपनी तरफ से बात करना बंद कर दिया है,अपनी ओर से बोलने का अधिकार सूत्रों को दे दिया है, इसलिए उन्होंने बताया है कि यह आंकड़ा सात करोड़ को छू सकता है। 2047 तक भारत को चूंकि विकसित राष्ट्र बनाने के लिए प्रधानमंत्री प्रतिबद्ध हैं, इसलिए इसे दस करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
वैसे सच यह है कि दोष हमारा है। मंत्री-मुख्यमंत्री-गृहमंत्री आदि दरअसल 'कड़ी' नहीं, 'कढ़ी' कार्रवाई की बात करते हैं। हमें चूंकि कार्रवाई के साथ 'कड़ी' सुनने की गंदी आदत पड़ चुकी है, इसलिए हम 'कढ़ी' को भी 'कड़ी' सुनते और पढ़ते हैं।टीवी और अखबारवाले भी 'कड़ी' और 'कढ़ी' में अंतर करना नहीं जानते, वे भी 'कढ़ी' को 'कड़ी' कह या लिख देते हैं। विनम्रता में मंत्रीगण भी इसका खंडन नहीं करते!
और जब 'कड़ी' की जगह 'कढ़ी' कार्रवाई होती है, तो हम सरकार और प्रशासन की निंदा करने लगते हैं। सरकार इसे भी सहन कर लेती है। सरकार दरअसल आजकल बहुत सहनशील हो चुकी है!
इस समाज में मज़ाक़ समझने की तमीज अब रही नहीं! वैसे 'कढ़ी' भी हर प्रदेश, हर क्षेत्र, बल्कि हर घर की अलग होती है।उसमें तीन ही चीजें कामन होती हैं -- छाछ, बेसन और नमक!उसी तरह कढ़ी कार्रवाई में सब जगह कढ़ी शब्द ही कामन होता है, सबमें बेसन, छाछ और नमक और पानी का अनुपात अलग होता है। कढ़ी से कढ़ी और उससे भी कढ़ी कार्रवाई का अर्थ है, कोई कार्रवाई नहीं! इस गूढ़ार्थ को लोग समझते नहीं और पें-पें, चें-चें करने लगते हैं!
तो इस देश में कढ़ी कार्रवाई होती रहती है। कभी-कभी कड़ी कार्रवाई भी हो जाती है लेकिन उसके लिए दोषी का 'बाबर की औलाद' होना जरूरी है, 'मुल्ला' होना आवश्यक है। हिंदू खतरे में है, इसलिए उन्हें 'टाइट 'करना समय की आवश्यकता है, पर हमें इससे घबराना नहीं है, क्योंकि हमें प्रधानमंत्री के नेतृत्व में 2047 में विकसित भारत बनाने का सपना पूरा करना है!
*(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)*
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*2. वे काग़ज़ नहीं दिखाएंगे! : राजेंद्र शर्मा*
मोदी जी के इन विरोधियों ने हिंदू संस्कृति का अपमान करने की कसम ही खा रखी है क्या? बताइए, चुनाव आयोग की ढिलाई से कर्नाटक में इनकी सरकार क्या बन गयी, आरएसएस से ही कागज दिखाने की मांग करने लगे।
हिंदू आरएसएस, उसका हिंदू राष्ट्र, फिर भी कहते हैं कि रजिस्ट्रेशन के कागज दिखाओ। जमा-खर्च का हिसाब बताओ।
जिस आरएसएस से सौ साल में किसी ने कागज दिखाने को नहीं कहा, उसे इन्हें कागज दिखाने होंगे? जिस आरएसएस के कागज देखने की अंगरेजों तक की हिम्मत नहीं पड़ी, उसे इन दलित साहबों को कागज दिखाने होंगे? और किसलिए ? सिर्फ इसलिए कि आरएसएस परिवार वाले खुद भी तो दूसरों से कागज दिखाने की मांग कर रहे थे -- पहले एनआरसी में और अब एसआईआर में! यानी मियां की जूती, मियां के ही सिर!
लेकिन, यह क्या हिंदू संस्कृति का खुला अपमान ही नहीं है। यह अर्द्ध-सत्य है कि आरएसएस परिवार कागज दिखाने के लिए कहता आया है। माने आरएसएस परिवार कागज दिखाने के लिए कहता जरूर आया है, लेकिन यह अधूरा सच है। बाकी आधा सच इसमें है कि वह किस से कागज दिखाने के लिए कहता आया है? किसी से छुपा नहीं है कि आरएसएस परिवार कोई सबसे कागज दिखाने की मांग नहीं करता है। वह भला हिंदुओं से कागज दिखाने की मांग क्यों करने लगा? हिंदुओं का तो यह देश ही है। सिर्फ इस देश के हिंदुओं का ही नहीं, दूसरे देशों के हिंदुओं का भी। इस देश में पैदा हुए हिंदुओं का ही नहीं, पड़ोसी देशों में पैदा हुए हिंदुओं का भी। तभी तो उन्होंने सीएए वाला कानून बनवाया था -- आस-पड़ोस के देशों के हिंदुओं का, बल्कि बाकी सब का स्वागत है, सिर्फ मुसलमानों को छोड़कर।
अब चूंकि मुसलमानों को छोड़ना है, तो कागज तो दिखाने ही पड़ेंगे। कागज बाकी सब को भी दिखाने पड़ सकते हैं, पर अपने लिए नहीं, मुसलमानों के बाहर रखे जाने के लिए। सब कागज दिखाएंगे, तभी तो जिन्हें बाहर किया जाना है, बाहर किए जाएंगे।
शाह साहब ने जो क्रोनोलॉजी बताई थी, वह तो याद होगी। पहले सीएए से मुसलमान छानकर अलग किए जाएंगे, फिर हिंदू अपनाए जाएंगे। अब बीच में एसआईआर आ जाएगा, हिंदुओं का भी वोट कट जाएगा, यह किसे पता था। खैर! बड़े-बड़े कामों में छोटी-मोटी दुर्घटनाएं तो हो ही जाती हैं।
खैर! मुद्दे की बात यह है कि कागज दिखाने की डिमांड, कम से कम हिंदुओं के लिए नहीं थी -- दूसरों के लिए ही थी। तभी तो ज्यादातर दूसरों ने ही उसका विरोध भी किया था। तब उसे दलील बनाकर, आरएसएस से कागज दिखाने की मांग कैसे की जा सकती है?
आरएसएस और क्या है और क्या नहीं है इसे छोड़ भी दें, तब भी कम से कम उसके हिंदू होने से कोई इंकार नहीं कर सकता है। वह बेचारा तो अपने जन्म से ही हिंदू-हिंदू ही जपता आया है। यह सच है कि उसके विरोधी शुरू से यह कहते आए हैं कि वह ध्यान हमेशा ही मुसलमान-मुसलमान का करता आया है ; कि कैसे मुसलमानों को नीचा दिखाएं ; कैसे हिंदुओं में मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाएं ; कैसे ऐसा राज बनाएं, जिसमें मुसलमान दबाए जाएं -- और दलित वगैरह और औरतें भी। पर ध्यान में चाहे जो भी हो, मुंह से तो वह हिंदू-हिंदू का ही जाप करता आया है।
और आज से नहीं, सौ साल से हिंदू-हिंदू का जाप करता आया है। इतनी ज्यादा तल्लीनता से हिंदू-हिंदू का जाप करता आया है कि जब पूरा देश अंगरेजी राज के खिलाफ लड़ रहा था, लोग प्रदर्शनों में लाठियां खा रहे थे, जेल जा रहे थे, फांसियां तक चढ़ रहे थे यानी देश भर में अच्छी-खासी उथल-पुथल चल रही थी, तब भी उन्होंने अपना ध्यान जरा-सा भी भटकने नहीं दिया और हिंदू-हिंदू का अपना जाप कभी टूटने नहीं दिया। उनके जाप में विघ्न डालने के चक्कर में जब गांधी जी ने सीने पर तीन गोलियां खाईं, तब भी उनका जाप जारी रहा। जब इंदिरा गांधी ने तैंतीस गोलियां खाईं, तब भी उनका जाप जारी था। और अब जब उनके स्वयंसेवक राज कर रहे हैं, हरेक संस्था उनकी शाखा बन चुकी है और ऑपरेशन लंगड़ा से लेकर ऑपरेशन एन्काउंटर और ऑपरेशन बुलडोजर तथा मॉब लिंचिंग का बोलबाला है, तब भी उनका हिंदू-हिंदू का जाप जारी है। और तो और, न कोई गौरी आया, न कोई बाबर, फिर भी राम मंदिर लुट गया, तब भी उनका वही जाप जारी है।
ऐसी घनघोर टाइप की हिंदू एंटिटी से उसके अपने हिंदू राष्ट्र में कागज दिखाने की मांग कैसे की जा सकती है, जबकि यह मांग उन्हीं ने खास तौर पर मुसलमानों वगैरह के लिए तय ईजाद की है। एंटिटी हमने जानबूझकर कहा है, क्योंकि आरएसएस, दूसरी भाषाओं की हम नहीं कहते, पर कम से कम हिंदी-संस्कृत में तो अपरिभाषेय है। उसे संगठन नहीं कह सकते, क्योंकि उसके लिए सदस्यता, संविधान, सांगठनिक ढांचा, चुनाव वगैरह, वगैरह के हजार दुनियावी झंझट हैं, जो उसे मंज़ूर नहीं हैं । उसे आंदोलन कह नहीं सकते, क्योंकि आंदोलन शब्द से ही वामपंथ की बू आती है। उसे महज ताना-बाना भी नहीं कह नहीं सकते, क्योंकि वर्दी से लेकर शाखा तक, उसका कठोर अनुशासन है। वह नेति-नेति की महान भारतीय परंपरा में है -- संगठन है भी, नहीं भी है ; आंदोलन है भी, नहीं भी है ; ताना-बाना है भी, नहीं भी है। जो है भी और नहीं भी है, उसके कागज कैसे! और जब कागज होंगे ही नहीं तो, कोई देखेगा क्या और भागवत जी दिखाएंगे क्या?
माना कि आरएसएस की अपनी हजारों करोड़ रुपये की संपत्तियां हैं। उसके आनुषांगिक संगठनों की मिलाकर तो लाखों करोड़ रुपये की संपत्तियां होंगी। माना कि उसका देश-विदेश तक फैले हजारों संगठनों का ताना-बाना है। माना कि उसका और उसके संगठनों का पचासों हजार करोड़ सालाना का खर्चा है। माना कि मौजूदा राज पर और उसकी सारी संस्थाओं पर, असल में उसी का कब्जा है। पर उससे क्या? सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान तो ईश्वर को भी कहते हैं। अब क्या आरएसएस से कागज मांगने वाले रामलला से कागज मांगने जाएंगे? क्या सुप्रीम कोर्ट ने रामलला से मस्जिद वाली जमीन के कागज मांगे थे? कल को ये दलित-वलित तो हिंदू धर्म से भी कागज मांगने लग जाएंगे! कागज की जरूरत मुसलमानों के लिए है, हिंदू आरएसएस से मोदी राज में कागज क्यों मांगे जाएंगे? वे कागज नहीं दिखाएंगे!
*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं।)*


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