जीरो टॉलरेंस नीति अन्य क्षेत्रों में भी लागू करे उत्तर प्रदेश सरकार

       डॉ. अजय कुमार मिश्रा

उत्तर प्रदेश में अपराध और अपराधियों के विरुद्ध अपनाई गई जीरो टॉलरेंस नीति तथा बुलडोजर कार्रवाई ने पिछले कुछ वर्षों में न केवल देश बल्कि विश्व स्तर पर भी ध्यान आकर्षित किया है। इस मॉडल की चर्चा व्यापक रूप से हुई है और कई राज्यों ने इससे प्रेरणा लेकर अपने यहां भी इसी प्रकार की कार्यवाही शुरू की है। आम जनता का एक बड़ा वर्ग भी इस नीति की सराहना करता है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या जनता के हितों की रक्षा का दायरा केवल अपराध नियंत्रण तक सीमित होना चाहिए?

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार जनता के लिए और जनता के माध्यम से संचालित होती है। इसलिए जनहित का मूल्यांकन केवल एक क्षेत्र में प्राप्त सफलता के आधार पर नहीं किया जा सकता। यदि जीरो टॉलरेंस नीति अपराध नियंत्रण में प्रभावी सिद्ध हुई है, तो इसका विस्तार उन अन्य क्षेत्रों तक भी होना चाहिए जो प्रत्यक्ष रूप से आम नागरिकों के जीवन को प्रभावित करते हैं।

आज भ्रष्टाचार प्रदेश के लिए कैंसर जैसी समस्या बन चुका है। आम जनता से जुड़े अनेक विभागों और सेवाओं में खुलेआम अनियमितताओं तथा आर्थिक शोषण की शिकायतें सामने आती रहती हैं। समाचार पत्रों और अन्य माध्यमों में आए दिन ऐसी खबरें प्रकाशित होती हैं, जो व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करती हैं। ऐसे में भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी उसी कठोरता और दृढ़ता की आवश्यकता है, जो अपराध नियंत्रण में दिखाई गई है।

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे बुनियादी क्षेत्र धीरे-धीरे निजी क्षेत्र के प्रभाव में आते जा रहे हैं। सरकारी संस्थान मौजूद तो हैं, लेकिन कई मामलों में वे भी निजी संस्थानों की कार्यशैली का अनुसरण करते दिखाई देते हैं। प्रश्न यह है कि क्या आज एक सामान्य नागरिक आकस्मिक चिकित्सा आवश्यकता पड़ने पर आसानी से आईसीयू बेड प्राप्त कर सकता है? वेंटिलेटर जैसी उन्नत सुविधाओं की बात तो दूर, विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के कारण आज भी बड़ी संख्या में मरीज प्रदेश के कुछ चुनिंदा चिकित्सा संस्थानों पर निर्भर रहने को मजबूर हैं। क्या सरकार निजी क्षेत्र के लिए ऐसे मानक और बाध्यताएं निर्धारित कर पाएगी, जो आम नागरिक के हितों की रक्षा सुनिश्चित करें?

रोजगार के क्षेत्र में भी स्थिति चिंताजनक है। सरकारी विभागों में स्थायी नियुक्तियों के स्थान पर ठेका प्रणाली को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि कर्मचारियों में असुरक्षा और असंतोष बढ़ा है। मानसिक दबाव, सामाजिक विषमता और भविष्य को लेकर अनिश्चितता जैसी समस्याएं भी इससे उत्पन्न हो रही हैं। कुछ वर्ष पूर्व सरकार द्वारा प्रत्येक परिवार के एक सदस्य को रोजगार उपलब्ध कराने जैसी बातें कही गई थीं, किंतु उनका प्रभावी क्रियान्वयन आज तक दिखाई नहीं देता।

अफसरशाही भी आम जनता की प्रमुख चिंताओं में से एक बनती जा रही है। शिकायतों के निस्तारण की व्यवस्था होने के बावजूद अनेक मामलों में केवल औपचारिकता पूरी की जाती है। आंकड़ों और रिपोर्टों के माध्यम से वास्तविक स्थिति को अलग रूप में प्रस्तुत कर उच्च स्तर पर संतोष का वातावरण बनाया जाता है। परिणामस्वरूप शिकायत निवारण के लिए बनाए गए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म आम नागरिकों के लिए अपेक्षित राहत प्रदान नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि जनता के भीतर असंतोष की भावना बढ़ती जा रही है।

यदि सरकारी विभागों की वेबसाइटों का अवलोकन किया जाए, तो कई स्थानों पर ऐसे संपर्क नंबर मिल जाते हैं जो या तो निष्क्रिय हैं अथवा ऐसे अधिकारियों के हैं जो सेवानिवृत्त हो चुके हैं। जहां सही नंबर उपलब्ध हैं, वहां भी कई बार संपर्क स्थापित नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में नागरिक अपनी समस्याओं के समाधान के लिए भटकने को विवश हो जाते हैं।

महंगाई भी आम नागरिक के जीवन को प्रभावित करने वाली सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। बढ़ती कीमतों के कारण लोग शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आवश्यक जरूरतों पर भी समझौता करने को मजबूर हो रहे हैं। यद्यपि सरकारी आंकड़े प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि का संकेत देते हैं, किंतु वास्तविकता यह है कि बड़ी आबादी अभी भी उस वृद्धि का समुचित लाभ प्राप्त नहीं कर पा रही है।

इसके अतिरिक्त, बढ़ती जनसंख्या भी प्रदेश के सामने एक गंभीर चुनौती के रूप में मौजूद है। समय-समय पर जनसंख्या नियंत्रण संबंधी नीतियों और कानूनों की चर्चा होती रही है, किंतु अब तक उन्हें व्यापक और प्रभावी रूप से लागू नहीं किया जा सका है।

आज समाचार पत्रों, टेलीविजन और सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाले विज्ञापनों तथा प्रचार अभियानों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि व्यवस्था पूरी मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है। किंतु जब आम नागरिक का प्रत्यक्ष सामना किसी व्यवस्था या सरकारी तंत्र से होता है, तब अक्सर यह महसूस होता है कि अनेक नियम और कानून केवल कागजों तथा विज्ञापनों तक ही सीमित रह गए हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने अपराध नियंत्रण के क्षेत्र में जिस दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया है, उसी प्रकार की प्रभावशाली और परिणामोन्मुख जीरो टॉलरेंस नीति भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और जनसेवा से जुड़े अन्य क्षेत्रों में भी लागू करने की आवश्यकता है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन जनता स्थायी होती है। इसलिए किसी भी परिवर्तन का अंतिम उद्देश्य नागरिकों के जीवन में वास्तविक और व्यापक सुधार होना चाहिए।

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