अलीगंज से लेवाना तक: कब खत्म होगी लापरवाही की
आग?
–
डॉ.
अजय कुमार मिश्रा
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज
क्षेत्र में हुई भीषण अग्निकांड की घटना, जिसमें
15 बच्चों की दर्दनाक मृत्यु हो गई,
ने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है ।
इस हादसे के बाद यह प्रश्न एक बार फिर गंभीरता से उठ खड़ा हुआ है कि क्या आज जीवन
की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी केवल आम नागरिक की ही रह गई है?
यह घटना कई ऐसे सवालों को जन्म देती है
जिनके उत्तर सभी जानते हैं, लेकिन शायद उन्हें सार्वजनिक रूप से
स्वीकार करने का साहस कोई नहीं जुटा पा रहा है ।
यह कोई पहली घटना नहीं है
। इससे पहले भी लखनऊ में कई बड़े
अग्निकांड हो चुके हैं। 15 जुलाई 2017 को
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के ट्रॉमा सेंटर में लगी आग में 13
लोगों की मृत्यु हो गई थी ।
5 सितंबर 2022 को
होटल लेवाना सुइट्स में आग लगने से 4 लोगों
की जान गई और 11 लोग अस्पताल में भर्ती हुए ।
6 जनवरी 2023 को
फीनिक्स मॉल में लगी आग में 10 कर्मचारी झुलस गए थे ।
9 जुलाई 2024 को
हुसैनगंज स्थित एक होटल में आग लगने पर बड़ी मुश्किल से 40 लोगों
को बचाया जा सका था
। 14 अप्रैल
2024 को चारबाग स्थित होटल में हुई आग की
घटना में 10 युवाओं को सुरक्षित निकाला गया था ।
वहीं, 17 मई 2025 को
होटल मोहन में लगी आग से लगभग 30 लोगों को बड़ी कठिनाई से बचाया गया था ।
हर बड़ी घटना के बाद शासन और प्रशासन
द्वारा कड़ी कार्रवाई तथा सख्त जांच के दावे किए जाते हैं, लेकिन
समय बीतते ही सब कुछ ठंडे बस्ते में चला जाता है ।
जिम्मेदार तंत्र तब तक निष्क्रिय बना रहता है, जब
तक कोई नई और बड़ी दुर्घटना सामने नहीं आ जाती ।
हम आखिर कितनी बड़ी त्रासदी का इंतजार
कर रहे हैं
? या फिर यह मान लिया जाए कि आम आदमी का
जीवन किसी के लिए विशेष महत्व नहीं रखता । इस स्थिति को समझने के लिए केवल एक
तथ्य पर्याप्त है
। हिंदुस्तान टाइम्स की 21 मई 2025 की
एक रिपोर्ट के अनुसार, आधिकारिक रिकॉर्ड में लखनऊ में
हॉस्पिटैलिटी व्यवसाय से जुड़े लगभग 2,600 प्रतिष्ठान
दर्ज हैं, जबकि राज्य अग्निशमन विभाग के रिकॉर्ड
के अनुसार केवल 93 होटल, गेस्ट
हाउस और रेस्टोरेंट के पास ही वैध फायर एनओसी (No Objection Certificate) उपलब्ध है ।
गौरतलब है कि अलीगंज की घटना से लगभग दो
वर्ष पूर्व, 9 नवंबर 2023 को
उत्तर प्रदेश सरकार ने निर्देश जारी किए थे कि सभी व्यावसायिक भवनों का प्रत्येक
तीन वर्ष में विद्युत सुरक्षा परीक्षण (Electrical Safety Check) कराना अनिवार्य होगा । कागजों पर नियम और मानक अत्यंत मजबूत
दिखाई देते हैं, लेकिन शासन-प्रशासन के तमाम दावों के
बावजूद उनका प्रभावी क्रियान्वयन धरातल पर दिखाई नहीं देता ।
यदि वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाए
तो लखनऊ के लगभग हर क्षेत्र में आवासीय परिसरों में खुलेआम व्यावसायिक गतिविधियां
संचालित हो रही हैं
। यह सब उन अधिकारियों की निगरानी में
हो रहा है, जिनकी जिम्मेदारी नियमों का पालन
सुनिश्चित करना है
। लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) नियमों
के विपरीत निर्माण और उपयोग को रोक पाने में विफल दिखाई देता है ।
वहीं बिजली विभाग औपचारिक कागजी प्रक्रियाओं के आधार पर आवासीय परिसरों में
व्यावसायिक कनेक्शन जारी कर देता है । नगर निगम की प्राथमिकता कर वसूली तक
सीमित नजर आती है, जबकि अग्निशमन विभाग की कार्रवाई
अधिकांश मामलों में केवल नोटिस जारी करने तक ही सिमट जाती है ।
आज शहर में अनेक कोचिंग संस्थान,
हॉस्टल, होटल, रेस्टोरेंट
और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान ऐसे भवनों में संचालित हो रहे हैं, जहां सुरक्षा मानकों की गंभीर अनदेखी की जा रही है ।
विडंबना यह है कि संबंधित अधिकारी प्रतिदिन उन्हीं सड़कों से गुजरते हैं, लेकिन उनकी नजरें तब खुलती हैं जब कोई बड़ी दुर्घटना हो जाती
है । इसके बाद अचानक सभी नियम और कानून याद आ जाते हैं तथा
जवाबदेही तय करने के नाम पर व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी को जिम्मेदार ठहराकर वरिष्ठ
स्तर पर जवाबदेही से बचने का प्रयास किया जाता है ।
कोई भी नियम आम नागरिक के हितों और
सुरक्षा की रक्षा के लिए बनाया जाता है । लेकिन जब उन नियमों को लागू कराने
वाले अधिकारी और कर्मचारी कुछ लाभ के लिए अपनी जिम्मेदारियों से समझौता कर लेते
हैं, तब ऐसी घटनाएं लगभग अपरिहार्य हो जाती
हैं ।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने लेवाना
होटल और अलीगंज जैसी घटनाओं पर त्वरित निर्णय लेकर जनता को यह विश्वास दिलाने का
प्रयास किया है कि दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई होगी और व्यवस्था सुधरेगी ।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उनके अधीन कार्यरत अधिकारी और कर्मचारी वास्तव में
जमीनी स्तर पर बदलाव लाना चाहते हैं ?
यदि पूरे शहर में फायर एनओसी को पूरी
तरह अनिवार्य कर दिया जाए और यह स्पष्ट आदेश जारी किया जाए कि बिना फायर एनओसी
संचालित किसी भी संस्थान को तत्काल प्रभाव से तब तक बंद रखा जाएगा, जब तक वह आवश्यक अनुमति प्राप्त न कर ले, तो स्थिति में बड़ा सुधार संभव है ।
इसके साथ ही यदि ऐसे नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध संबंधित थानों को
तत्काल प्राथमिकी दर्ज कर गिरफ्तारी करने का अधिकार दिया जाए, तो भविष्य में होने वाली ऐसी घटनाओं पर 90 प्रतिशत तक नियंत्रण पाया जा सकता है ।
दुर्भाग्य यह है कि ऐसे अनेक संस्थानों
के संचालकों की राजनीतिक और आर्थिक पहुंच इतनी मजबूत होती है कि नियमों की अनदेखी
करना सामान्य बात बन चुकी है । यही कारण है कि यह समस्या केवल आज की
नहीं, बल्कि भविष्य में भी बनी रहने की आशंका
है ।
ऐसे में कठोर नियम बनाने के साथ-साथ
उनका निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन ही एकमात्र समाधान है ।
इस दिशा में यदि प्रदेश की जनता किसी से सबसे अधिक उम्मीद कर सकती है, तो वह उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री हैं, जिनकी पहचान कठोर प्रशासनिक निर्णयों और कानून के प्रभावी
अनुपालन के लिए स्थापित हो चुकी है । अन्यथा
की स्थिति में असामान्य मौतों का सिलसिला लगातार जारी रहेगा !
------------
%20(1).jpg)
0 टिप्पणियाँ
If you have any doubts, please let me know