मन को निर्मल रखने से ईश्वर की कृपा से सहज ही प्राप्त होती है

-- डा. भारती गाँधी, संस्थापिका-निदेशिका, सी.एम.एस.

लखनऊ, 7 जुलाई। ‘मन को स्वच्छ और निर्मल रखने से हमारे विचार, वचन और कर्म भी पवित्र बनते हैं, जिससे ईश्वर की कृपा सहज रूप से प्राप्त होती है। जब हृदय में ईश्वर का वास होता है, तब बुरे विचार, ईष्र्या, क्रोध और अहंकार स्वतः दूर होने लगते हैं तथा उनके स्थान पर प्रेम, दया, करूणा और सद्भाव जैसे गुण विकसित होते हैं’, ये विचार हैं सिटी मोन्टेसरी स्कूल की संस्थापिका निदेशिका डाॅ भारती गाँधी के, जो सी.एम.एस. प्रधान कार्यालय में आयोजित एक वैचारिक-आध्यात्मिक सत्संग सभा में बतौर मुख्य वक्ता बोल रही थीं। सत्संग सभा में श्री राबर्ट 

गाँधी एवं श्री महेश अग्रवाल समेत 75 से अधिक विभिन्न धर्मों के अनुयाइयों ने प्रतिभाग कर अपने विचार व्यक्त किये। 

सत्संग में आगे बोलते हुए डा. भारती गाँधी ने कहा कि मनुष्य जब हर परिस्थिति में ईश्वर को अपने हृदय में बसाकर जीवन जीता है, तब उसके निर्णय धर्म, सत्य और न्याय पर आधारित होते हैं। ऐसा व्यक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अपने व्यवहार से भी ईश्वर के आदर्शों को प्रकट करता है। यही सच्चे अर्थों में मनुष्यत्व की पहचान है, जहाँ व्यक्ति स्वयं के साथ-साथ दूसरों के जीवन में भी सुख, शांति और प्रेम का प्रकाश फैलाता है।

इस अवसर पर अपने विचार रखते हुए श्री राबर्ट गांधी ने कहा कि स्वच्छ नदियाँ, हरियाली और शुद्ध वातावरण ही आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी धरोहर और सच्ची सेवा हैं। नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि हमारी आस्था और संस्कृति की धरोहर हैं। इसलिए हमें नदियों को स्वच्छ रखना चाहिए, उनमें पाॅलीथिन, प्लास्टिक या अन्य कचरा कभी नहीं डालना चाहिए। अधिक से अधिक पौधे लगाकर और प्रकृति का संरक्षण करके हम पर्यावरण को शुद्ध, संतुलित और जीवनदायी बना सकते हैं।

इस अवसर पर कई अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किये। एक वक्ता का कहना था कि 

स्व. जगदीश गांधी की तरह ही हमें भी जरूरतमंदों के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिये, उनके पढ़ाये बच्चे आज बड़े बड़े पदों पर कार्यरत है। एक अन्य वक्ता का कहना था कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन धार्मिक आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। हर इंसान की पहचान उसकी अच्छाई होती है और इंसान अपने कर्मों से ही महान बनता है। जब भगवान ने सबको समान बनाया है तो हम इंसानों भी भेदभाव से दूर ही रहना चाहिए। सत्संग का समापन सुमधुर भजनों ‘पवित्र मन रखो, पवित्र तन रखो‘ एवं ‘आज विश्व को नये विचार चाहिए’ के प्रस्तुतिकरण एवं प्रसाद वितरण से हुआ।