*न माथे पर शिकन, न किसी तरह की लाज या शरम : इतनी ढिठाई कहाँ से आती है?*

*(आलेख : बादल सरोज)*


चोर अमूमन शातिर होते हैं, मगर अपनी सीमा जानते हैं। डकैत निर्लज्ज भी होते हैं, दुस्साहसी भी। राम मंदिर के नव्य, भव्य और दिव्य अयोध्या काण्ड के मुजरिमों की दीदादिलेरी इन दोनों से अलग एक नयी श्रेणी सृजित करती है। इन खूबियों में एक नयी योग्यता जोड़ती है और वह है ढीठ होने की विशेषता : स्वाभाविक भी है, क्योंकि, परत-परत खुलने के बाद साफ़ हो चुका है कि जिन पारंपरिक अर्थों में चोरी और डकैती का उपयोग किया जाता है, यह उनसे बहुत आगे की बात है। इन दोनों भाववाचक संज्ञाओं को सुनकर जिस तरह की छवि बनती है, जो हुआ है, वह उसमे समा नहीं सकता। हिंदी व्याकरण को समृद्ध करने के इस अनुपम योगदान के लिए देश को चढ़ावा काण्ड के शूरवीरों का कृतज्ञ होना चाहिए। 


शुरू-शुरू में चम्पतियों को लगा कि जो उजागर हुआ है, उसे चोरी समझा जा रहा है, सो उससे निबटने के लिए वे सीनाजोरी करने लगे। सवाल उठाने वालों पर ही सवाल उठाने की अपनी आजमाई हुई कुटिलता आजमाने लगे। ‘मंदिर हमने बनाया है, मंदिर हमारा है, उस पर सवाल उठाने वाले आप कौन हैं?’, ‘जो कभी मंदिर नहीं आये, वे किस हैसियत से पूछताछ कर सकते हैं, जिन्होंने चन्दा नहीं दिया, उन्हें चन्दे का क्या हुआ, क्या नहीं हुआ, के फटे में टांग अड़ाने का क्या अधिकार है?’ वगैरा-वगैरा के बयान बरसाए जाने लगे। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने शुरुआत की, उपमुख्यमंत्री पंडित ब्रिजेश पाठक ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति और अयोध्या की छवि खराब करने तथा सनातन परंपरा को कमजोर करने की साजिश बताकर अग्निहोत्र की भूमिका निबाही और इशारा मिलते ही तुरंतई पूरा कुनबा क्या हुआ, क्यों हुआ, कब हुआ की बजाय एक राग में हुआं-हुआं की आहुतियाँ देने दौड़ पड़ा । 

लेकिन इससे मुश्किल कम होने की जगह बढ़ती ज्यादा दिखी। जितनी जोर से ‘हमारा मंदिर–हमारा मंदिर’ बोला गया, उससे कहीं ज्यादा जोर से वह हमारी चोरी–हमारी डकैती की आत्मस्वीकारोक्ति में प्रतिध्वनित हुआ। खुद इन्हीं के कुनबे के कुलदीपक ब्रजभूषण शरण सिंह ने स्वयं माना कि वे कभी इस मंदिर में गए ही नहीं, क्योंकि उन्हें पहले दिन से पता था कि इसमें क्या-क्या अघट घट रहा है। यह तर्क उलटा पड़ने लगा और लोग पूछने लगे कि तुम्हारे कुनबे ने आजादी की लड़ाई में भाग नहीं लिया था, तो फिर तुम इस आजाद हिन्दुस्तान में क्या कर रहे हो? मरता क्या न करता, के भाव से भाई लोग धूर्तों की आख़िरी पनाहगाह – राष्ट्रवाद की भी ज्यादा नुकीली किस्म -- धार्मिक राष्ट्रवाद पर आ गए। मंदिर की लूट पर किसी भी किस्म का प्रश्न उठाने को हिन्दू धर्मं का अपमान और देशद्रोह बताने पर आमादा हो गए।


आखिर इतनी ढिठाई और निर्लज्जता आती कहाँ से है कि एकदम लिपे पुते-पकडे जाने के बाद भी न माथे पर कोई शिकन है, न चेहरे पर किसी तरह की लाज या शर्म या डर ही है। यह सिर्फ ‘सैयां भये कोतवाल अब डर काहे का’ का मामला नहीं है : यह ‘खुद चौकीदार ही चोर है,उसी के हाथ में सत्ता का सेंगोल है’ जैसी निरापद स्थिति और अभयदान की गारंटी जनित अति-आत्मविश्वास है।


7 जून से लगातार खुल रहे भानमती के पिटारे से हर रोज आधा दर्जन से ज्यादा कारनामे बाहर आ रहे हैं। ये कारनामे, जिन्हें ये लिबरल, सिक्युलर या वामी कहते हैं, के द्वारा नहीं, बल्कि खुद उनके द्वारा उजागर किये जा रहे हैं, जो कट्टरता के मामले में इनसे कम भगवे हिन्दू नहीं हैं, कुछ तो इनसे ज्यादा ही हैं। जिन्हें कुनबा मंदिर विरोधी बताता है, वे कुछ भी नहीं बोल रहे – जिन्होंने इस मंदिर के लिए अपना बहुत कुछ चढ़ाया, वे ही चीख-चीख कर बता रहे हैं कि उनके साथ क्या-क्या हुआ। अब तक आई जानकारियों से पता चलता है कि चौर्यकला के सिद्धों के गिद्ध-श्रेष्ठ के हौसले इतने बुलंद थे कि ठगने के मामले में उन्होंने भारत सरकार के गृहसचिव को भी नहीं बख्शा।


इस पूर्व गृह सचिव एस लक्ष्मीनारायणन ने देश को अपने लुटने की विलाप चतुष्पदी सुनाते हुए बताया कि “8 अप्रैल 2024 को चैत्र नवरात्रि के पहले दिन मैंने राम मंदिर ट्रस्ट को डेढ़ क्विंटल की रामचरितमानस भेंट की थी। तीन-चार महीने बाद जब मेरे रिश्तेदार अयोध्या गए, तो उन्हें वह रामचरितमानस दिखाई नहीं दी। इसके बाद मैं खुद अयोध्या गया। चंपत राय ने मुझे 9 घंटे इंतजार करवाया। फिर उन्होंने कहा -- मेरे पास कई लोगों के आभूषण और कई तरह की चीजें आती हैं, तो क्या मैं सिर्फ इन्हीं सब का डिस्प्ले करता रहूं? यह सुनकर मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने हाथ जोड़कर उनसे कहा -- सर, मेरी पूरी जिंदगी की पूंजी है। मैंने अपनी मां की पूरी ज्वेलरी रामचरितमानस में लगवाई है।


बकौल पूर्व गृह सचिव यह रामचरितमानस 1000 पेज की है। वजन-155 किलोग्राम है। इसमें 4 किलो सोने और 151 किलोग्राम तांबे का इस्तेमाल किया गया है। हर पेज पर 24 कैरेट सोने की परत चढ़ाई गई है। साथ ही हर पेज पर 3 किलोग्राम तांबा भी लगा है। मैंने चम्पत राय को बताया कि जिन लोगों ने संसद के लिए सेंगोल बनाया था, उन्हीं लोगों ने इसे भी बनाया है। कृपा करके इसे रखवा दीजिए। आपने पहले मुझे आश्वस्त किया था कि इसे रामलला के पास रखवाएंगे। फिर आपने कहा कि वहां नहीं रख सकते, बाहर रखवाएंगे।" उन्होंने बताया कि चंपत राय ने कहा -- जो मैं चाहूंगा, वही होगा। जिसे जो करना है, करिए। बहुत दुखी होकर मैंने नृपेंद्र मिश्रा से बात की। उन्होंने कहा- भाई, चंपत राय ही यह सब देखते हैं। मैं उनसे बात करूंगा, लेकिन कोई गारंटी नहीं दे सकता। मैंने 50 वॉट्सऐप मैसेज और 10-12 पत्र लिखे। उनमे अपील की कि रामचरितमानस मंदिर में रखवा दीजिए, लेकिन वे नहीं माने। फिर मैंने गोपाल राव से संपर्क किया। उन्होंने कहा -- मैं कुछ नहीं कर सकता। इसके बाद मैं फिर अयोध्या गया। 4 घंटे इंतजार के बाद चंपत राय मिले। उन्होंने मुझसे कहा -- मैं कुछ नहीं कर सकता, आपको जहां जाना है, जाइए। बाद में यह आला अफसर संघ प्रमुख मोहन भागवत के पास भी गए – उन्होंने भी सिर्फ सुना, न कुछ कहा, न कुछ भी किया ।


इस तरह इति सिद्धम कि मंदिर में जो हो रहा था, उसकी जानकारी संघ प्रमुख को थी और किसी ऐरे-गैरे नत्थू खैरे ने नहीं, देश के गृह सचिव रहे व्यक्ति ने दी थी। चम्पत राय की ताकत कितनी थी, इसकी अनेक कहानियां इस बीच सामने आयीं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद मोदी सरकार द्वारा गठित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में जितने भी हैं, वे या तो सीधे संघ के शाखा मृग रहे हैं या उसकी हिन्दुत्ववादी विचारधारा के मुखर प्रवक्ता रहे हैं। इन सब अपनों के बीच भी चम्पत राय की क्या हैसियत थी, यह इस न्यास के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि जी महाराज की खुद सुनाई व्यथा से साफ़ हो जाता है। वे कहते हैं कि वे तो सिर्फ नाम के कोषाध्यक्ष थे। न उनसे कुछ पूछा जाता था, न बताया जाता था। सब कुछ केवल, मात्र, सिर्फ चम्पत राय के हाथों में था।

चम्पत राय की कारगुजारियों की आँखों देखी बताते हुए, प्रधानमंत्री ने जिस झंडे को फहराया था, राम मंदिर के उस ध्वज को डिज़ाइन करने वाले इंडोलॉजिस्ट ललित मिश्रा कहते हैं कि ‘ये मेरी आँखों के सामने की बात है। चंपत राय अपने लोगों के साथ होटल व लैंड की डील कर रहे थे। यह सब करते हुए मैंने कई बार देखा।‘ 


मंदिर आन्दोलन के जबर नेता विनय कटियार अब भले चुप्प कर दिए गए हैं, मगर पहले ही काफी बोल-बता चुके हैं। बड़ा और प्रमुख सवाल यह है कि इतना सब सामने आने के बाद भी चम्पत राय का नाम आपराधिक मुकद्दमे में से चम्पत कैसे हो गया? इतने ताकतवर और निर्भीक कैसे हो गए चम्पत राय कि दुनिया भर में चर्चा और लज्जा का विषय बनने के बाद भी, जैसा कि स्टिंग ऑपरेशन से सामने आया है, वे अभी भी बिना रसीदों के चांदी और चन्दा लेने की डील्स कर रहे हैं। करोड़ों रुपयों के चौपहिया वाहनों में बैठकर ट्रस्ट की मीटिंग में जा रहे हैं और इस्तीफा लिख रहे हैं तो ऐसे, जैसे पृथ्वी पर अहसान कर रहे हों। खुद अपने ही खिलाफ हो रही जांच रिपोर्ट को अपने ही सामने प्रस्तुत करवाकर उसकी समीक्षा कर रहे हैं। हेंकड़ी इतनी कि खुद अपने हाथों लिखी चिट्ठी में यह जानकारी भी दे रहे हैं और धमकी भी।


अभी 7 जुलाई को लिखी अपनी चिट्ठी में चम्पत राय लिखते हैं कि “मैंने मौन व्रत धारण कर लिया है।“ इसी के साथ वे बताते हैं कि “6 जुलाई को हुयी मंदिर ट्रस्ट की बैठक में एसआईटी – विशेष जांच दल – की प्राथमिक रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी। यद्यपि यह परम गोपनीय थी।“ आगे लिखते हैं कि “अंतिम रिपोर्ट आने के बाद सभी बिंदुओं पर उत्तर क्रमानुसार दूंगा –सभी सत्य सामने आ जाएगा।“ 


जिसके खिलाफ जांच चल रही है, उसी के सामने “परम गोपनीय” रिपोर्ट कैसे प्रस्तुत कर दी गयी ? इसका जवाब स्वयं उन्हीं के द्वारा लिखी इस चिट्ठी में हैं, जहां वे बताते हैं कि “मैं वर्ष 1991 में अयोध्या में भेजा गया संगठन (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) द्वारा।“ चम्पत राय की शक्ति इस संगठन से आती है और उन “सभी सत्यों” से बढ़ जाती है, जिन्हें वे अंतिम रिपोर्ट आ जाने के बाद उजागर करने की धमकी देते हैं। 


इस तरह इस पूरे काण्ड के शीर्ष पर जो तीन प्रमुख हैं, उनमें चम्पत राय बोल चुके हैं। जिनके द्वारा शिलान्यास किया गया, स्थापित, उदघाटित, प्राण प्रतिष्ठित, ध्वजारोहित किया गया, वे प्रधानमंत्री मोदी इन दिनों राम के मुस्लिम देश इंडोनेशिया में चमत्कारी करतब दिखा रहे हैं। इस काण्ड पर मुंह नहीं खोले है। तीसरे – जो असल में पहले हैं –राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख तो नहीं बोले, किन्तु उनके महासचिव – सरकार्यवाह – जरूर दो-दो भाषाओं में सन्देश जारी कर चुके हैं।


उनके अति संक्षिप्त संबोधन-प्रबोधन में करोड़ों धर्मालंबियों की आस्था और क़ानून के राज में विश्वास करने वालों के विश्वास को लगी ठेस पर न ग्लानि है न अफ़सोस, न पश्चाताप है न खेद। अपराध उजागर करने वालों और कार्यवाही की मांग करने वालों को ही दोषी ठहराने की चतुराई जरूर है। देश से माफ़ी मांगने की बजाय वे कहते हैं कि “राष्ट्रीयस्वयंसेवक संघ संपूर्ण हिन्दू समाज से भी आह्वान करता है कि इस कठिन क्षण में वह आवश्यक धैर्य और संयम का परिचय दें तथा इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का लाभ उठाकर हिन्दू विरोधी, राष्ट्र विरोधी शक्तियों के हिंदू धर्म एवं समाज को बदनाम करने के षड़यंत्रों को विफल करे।“ 


अब यह संयोग है या प्रयोग कि इस बीच केदारनाथ और बदरीनाथ में भी इसी तरह की धर्मसम्मत मानी जाने वाली साईंफनिंग – नल्ली लगाने -- की खबरें आई हैं। इन पर शायद वे प्रबोधन की अगली किश्त जारी करें या अनार्य देवता शंकर का मामला है, इसलिए न भी करें।


इसी बीच चुपके से चम्पत राय का इस्तीफा लेकर ट्रस्ट में नयी नियुक्तियां कर दी गयी हैं। किन्हीं बजरंग लाल बागड़ा को ट्रस्ट का नया मुख्य महासचिव नियुक्त किया गया है। वे विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री और नाल्को के पूर्व चेयरमैन हैं। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट होने के कारण उम्मीद है कि जो किया जाता रहा, वह अब ज्यादा व्यवस्थित तरीके से किया जाएगा। बिना किसी इंटरव्यू, बिना किसी चयन प्रक्रिया के यह नियुक्ति, जाहिर है, सीधे संघ के कहने पर हुई है। लगता है, चम्पत राय की जगह लेने के लिए उनकी योग्यता और प्रतिभा का मूल्यांकन उनके घपले करने के पिछले रिकॉर्ड के आधार पर किया गया है।,। इस मामले में बागड़ा जी को खूब महारत हासिल है।


जब वे सरकारी नवरत्न कंपनी नाल्को में सीएमडी के ओहदे पर थे, तब 2013 में कई करोड़ के घोटाले सामने आए थे, जिसे लेकर केन्द्रीय सतर्कता आयोग – सीवीसी – ने बागड़ा को क्लीयरेंस नहीं दी थी और इनको रिटायरमेंट के 10 महीने पहले ही पद से हटा दिया गया था। इन घोटालों में 107 करोड़ का फ्लाई-ऐश निपटान घोटाला, 15 करोड़ का चूना खरीद घोटाला, कास्टिक सोडा खरीद घोटाला और भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप थे। 


देश में लाखों साधु, संत, महात्मा, शंकराचार्य हैं, न्यास को उनमें से कोई नहीं मिला। भ्रष्टाचार के एक आरोपी सपूत को हटाकर उसकी जगह दूसरे आरोपी पूत को बिठाकर संघ और भाजपा ने पूरी ढीठता के साथ अपनी नीयत पालने में ही बता दी है कि दुनिया कुछ भी कहे, हजारों करोड़ चढ़ावा डकैती का परनाला वहीँ गिरेगा।


इस तरह, जिन्हें अब भी कोई मुगालता था, उनका वहम दूर हो जाना चाहिए कि इस अयोध्या काण्ड में जो भी हुआ वह सिर्फ चोरी-डकैती या भ्रष्टाचार भर नहीं है। उसकी एक क्रोनोलॉजी भी है, उसका एक विचार भी है। बहरहाल इस विचार कुटुंब को पता है कि इस बार कुछ ज्यादा ही ऊंची हो गयी है। यह कुनबा अडानी-अम्बानी के लिए लूट कराएगा, इसका विश्वास करने वाले भी मंदिर को ही लूट लेंगे, की आशंका उन्हें भी नहीं थी। वे स्तब्ध और आहत दोनों हैं।


हाल में हुए सी-वोटर सर्वे ने भी इसे दर्ज किया है। उसके मुताबिक़ 86% लोग इस लूट से गुस्से में हैं और इनमें बड़ा हिस्सा भाजपा के एनडीए को वोट डालने वालों का है । अयोध्या में तो यह गुस्सा इतना है कि गाँव-शहर में आरएसएस वालों को लोग अपने घर में बैठने तक नहीं दे रहे।कोई जबरदस्ती बैठ भी जाता है, तो घर वाले खुद बाहर आ जाते हैं। 


इस दुर्गत को सुधारने के लिए बीजेपीने उत्तर प्रदेश की सभी विधानसभा सीटों पर धार्मिक और राजनीतिक जुड़ाव का एक कार्यक्रम लिया है। भाजपा कार्यकर्ताओं को छोटे कस्बों और गांवों के मंदिरों में सक्रिय किया जाएगा। स्थानीय मंदिरों में सार्वजनिक भजन-कीर्तन और भंडारे किए जाएगें। "स्वच्छता अभियान" के बहाने छोटे-बड़े मंदिरों में श्रमदान होगा। लोग आशंकित है कि पता नहीं, क्या-क्या साफ़ होने वाला है । मोदी-योगी सरकार के काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल लोक और भव्य राम मंदिर निर्माण का प्रचार किया जाएगा। बताया जाएगा कि विपक्ष हमेशा से सनातन विरोधी रहा है और वो सिर्फ चुनावी फायदे के लिए चंदे का मुद्दा उठारहे हैं। 

कुल मिलाकर यह कि गठरी में लागे चोर से ध्यान बंटाने के लिए ढोल, मंजीरे, शंख जोरों से बजाये जायेंगे । इन्हें शायद पता नहीं है कि ये पब्लिक है, जो सब जानती है,अच्छी तरह से बाजा बजाना भी जानती है।



*(लेखक लोकजतन के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त साचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)*