Article by GB Reddy Sir
भारत जल रहा है! अनंत आंतरिक सुरक्षा चुनौतियाँ
पिछले 25 वर्षों से भी अधिक समय से मैं लगातार तीन वास्तविकताओं को रेखांकित करता रहा हूँ, जिन्हें भारत नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकता—भूमि सीमित है, संसाधन तेजी से समाप्त हो रहे हैं और तकनीक असाधारण गति से विकसित हो रही है। स्वतंत्रता के बाद अनेक अवसर गंवाने के बावजूद यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि पिछले एक दशक में परिवर्तन की शुरुआत हुई है। भारत ने कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में खोई हुई जमीन फिर से हासिल करनी शुरू की है और इस प्रगति को संकीर्ण राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने के बजाय उसका निष्पक्ष रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए।
हालाँकि, आज की अनेक चुनौतियों की जड़ें दशकों तक चली आई अपर्याप्त प्राथमिकताओं और उपेक्षा में निहित हैं। कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों से लेकर विभिन्न गठबंधन सरकारों तक, लगातार सत्ता में रही सरकारें कई संरचनात्मक कमजोरियों को उस तात्कालिकता के साथ संबोधित करने में विफल रहीं, जिसकी आवश्यकता थी।
शिक्षा और रोजगार की चुनौती
शिक्षा इसका एक प्रमुख उदाहरण है। दशकों तक न तो शिक्षा के विस्तार (Quantity) पर पर्याप्त ध्यान दिया गया और न ही उसकी गुणवत्ता (Quality) पर। कौशल विकास तकनीकी परिवर्तन की गति के साथ कदमताल नहीं कर सका। इसका एक परिणाम वह बहुचर्चित ब्रेन ड्रेन (Brain Drain) भी रहा।
इसके परिणामस्वरूप युवाओं की एक ऐसी पीढ़ी सामने आई जो वर्षों की निराशा के बाद तेजी से बदलाव चाहती है। उन्हें एक ऐसी व्यवस्था का सामना करना पड़ा जो धीमी, पदानुक्रमित और उनकी आकांक्षाओं से कटी हुई दिखाई देती रही।
चुनौती अत्यंत बड़ी है। हर वर्ष लाखों युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं, जबकि महिलाएँ भी तेजी से समान अवसर और विभिन्न व्यवसायों एवं क्षेत्रों में समान भागीदारी की मांग कर रही हैं।
कोई भी राजनीतिक दल सरकारी नौकरियाँ पैदा करके सबको उपलब्ध नहीं करा सकता, क्योंकि सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के आर्थिक गतिविधियों के लगभग सभी क्षेत्रों में प्रवेश के साथ निजी क्षेत्र में भी रोजगार के अवसर सीमित होने की संभावना है।
विशेषकर युवा तथा जन्म की परिस्थितियों के कारण ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों का एक बड़ा हिस्सा धीमी आर्थिक प्रगति से निराश और असंतुष्ट है। वे उस अन्यायपूर्ण यथास्थिति में तत्काल परिवर्तन चाहते हैं, जिसे ऊपर से थोपे गए जड़, वृद्ध और वंशवादी नेतृत्व द्वारा बनाए रखने का आरोप लगाया जाता रहा है।
आज राजनीतिक नेताओं के बीच “युवा” और “बेरोजगारी” तथा “डेमोग्राफिक डिविडेंड” यानी जनसांख्यिकीय लाभांश का उल्लेख करना एक राजनीतिक फैशन बन गया है। लेकिन वास्तविक चुनौती को सामने रखने से लगभग सभी बचते हैं।
हर वर्ष लगभग 1–2 करोड़ युवा रोजगार बाजार में प्रवेश कर रहे हैं। आज महिलाएँ समान अवसर चाहती हैं और वे केवल घरेलू कार्यों तक सीमित रहना स्वीकार नहीं करना चाहतीं। वे भी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी जनसंख्या के अनुपात के अनुरूप रोजगार के अवसर चाहती हैं। सरकारी नौकरियों की मांग भी सभी वर्गों में बनी हुई है।
यहीं पर राजनीतिक बयानबाजी अक्सर वास्तविकता से पीछे रह जाती है। लगभग हर राजनीतिक दल युवाओं, बेरोजगारी और जनसांख्यिकीय लाभांश की बात करता है। लेकिन बहुत कम लोग इतनी बड़ी और आकांक्षी आबादी के लिए पर्याप्त उत्पादक अवसरों के निर्माण की वास्तविक संरचनात्मक चुनौती को स्वीकार करते हैं।
24x365 की राजनीति और सामाजिक अशांति
सबसे अधिक निराशाजनक, लेकिन वास्तविक समस्या है 24x365 की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता।
सत्ता से बाहर रहने वाले नेता अक्सर निर्लज्जता और अहंकार के साथ असंतुष्ट वर्गों की भावनाओं को संकीर्ण सामुदायिक या जातीय आधार पर भड़काते हैं। वे संकट पैदा करते हैं, आंदोलन और प्रदर्शन शुरू करवाते हैं तथा कभी-कभी आत्मदाह जैसे चरम कदमों को भी लोकतंत्र के नाम पर उचित ठहराने का प्रयास किया जाता है।
अक्सर ऐसी परिस्थितियाँ नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं। परिणामस्वरूप सरकारी और निजी संपत्तियों को नुकसान पहुँचता है, कानून-व्यवस्था बिगड़ती है और इससे भी अधिक चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है जब छात्र और युवा आत्महत्या जैसे कदम उठाते हैं।
जब भीड़ को नियंत्रित करने के उपाय विफल होते हैं, तो पुलिस को हिंसक भीड़ को नियंत्रित करने के लिए गोली चलाने तक की नौबत आ जाती है। इससे कार्यकर्ताओं, राहगीरों या निर्दोष नागरिकों की मौत हो सकती है। ऐसे अवसरों का उपयोग चरमपंथी और हाशिये के तत्व समाज के विभिन्न वर्गों के बीच टकराव और ध्रुवीकरण बढ़ाने के लिए करते हैं।
भारत की जटिल सामाजिक संरचना
भारत का सामाजिक ताना-बाना इतना जटिल है कि इसे पूरी तरह समझना अत्यंत कठिन है। इसकी सामाजिक संरचना की भूलभुलैया, अचानक आने वाले मोड़ और कई बार बंद रास्ते किसी जटिल पहेली जैसे प्रतीत होते हैं।
अकादमिक जगत में अक्सर यह कहा जाता रहा है कि भारत अतीत में भी और वर्तमान में भी एक चौराहे पर खड़ा देश रहा है। लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत अपनी विशिष्ट गति से लगातार आगे बढ़ रहा है।
शायद यही लोकतंत्र की अपरिहार्य प्रकृति—या उसका अभिशाप—है। भारत कभी-कभी ऐसे समुद्र में बिना पतवार के जहाज की तरह दिखाई देता है, जो ऊँची लहरों में बुरी तरह डगमगा रहा हो और कभी-कभी डूबता हुआ प्रतीत होता हो, फिर भी किसी तरह तैरता रहता है।
आधुनिक भारत की अनंत संकट-श्रृंखला
संक्षेप में कहा जाए तो “आधुनिक भारत” अनगिनत संकटों और संघर्षों से घिरा हुआ है।
इनकी मूल वजहों को संक्षेप में समझा जा सकता है। लगातार सत्ता में रहे राजनीतिक नेतृत्व ने अपने स्वार्थ, आत्ममुग्धता और सत्ता-केंद्रित मानसिकता—“मैं, मेरा, मेरे लिए और मेरी संतति”—के जुनून में कई “हिमालयी भूलें” की हैं।
इसलिए भारत के सामने मौजूद आंतरिक रणनीतिक सुरक्षा चुनौतियाँ अत्यंत गंभीर और जटिल हैं।
इन चुनौतियों की बुनियादी प्रकृति को समझना अत्यंत आवश्यक है। भारत की आंतरिक सुरक्षा की समस्याएँ असाधारण रूप से जटिल हैं।
मेरी वर्ष 2001 में प्रकाशित पुस्तक “Nation in Crisis – Dimensions of National Security and Terrorism” में मैंने रणनीतिक सुरक्षा मुद्दों और परिचालन स्तर के संघर्षों का अलग-अलग विश्लेषण किया था। इनमें से कई चिंताएँ आज भी प्रासंगिक हैं।
सबसे गंभीर रणनीतिक चुनौतियों में से एक है जनसांख्यिकीय परिवर्तन (Demographic Transition)—जिसे आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों की “जननी” कहा जा सकता है।
इसके बाद भ्रष्टाचार आता है, जिसे इसकी “पालक माता” कहा जा सकता है।
इसके साथ राष्ट्रीय मूल्यों का संकट, नेतृत्व का संकट और संस्थागत विश्वसनीयता का संकट भी जुड़ा हुआ है।
धार्मिक संघर्ष, क्षेत्रीय कट्टरता, आतंकवाद, संगठित अपराध, सुरक्षा बलों पर बढ़ता दबाव और देश के विभिन्न हिस्सों में लंबे समय से लंबित समस्याएँ इस जटिलता को और बढ़ाती हैं।
जनसांख्यिकीय परिवर्तन : आंतरिक सुरक्षा की “जननी”
वास्तविकता यह है कि राजनीति और जनसांख्यिकीय परिवर्तन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
लोकतंत्र में राजनीतिक परिणाम जाति, समुदाय, वर्ग, लिंग और विभिन्न सामाजिक समूहों की संरचना तथा उनके बीच के संबंधों से प्रभावित होते हैं।
राजनीतिक सत्ता का बंटवारा भी इन्हीं सामाजिक समीकरणों पर निर्भर करता है। सामाजिक समूहों के पारंपरिक संतुलन में मामूली बदलाव भी राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में बड़े परिवर्तन ला सकता है।
यही बदलाव जातीय, सांप्रदायिक और जातिगत तनाव तथा हिंसा को बढ़ावा दे सकते हैं। इसका स्वाभाविक परिणाम आंतरिक हिंसा का विस्तार होता है।
“विविधता में एकता” हमारा एक लोकप्रिय नारा है, लेकिन इसे वास्तविकता में बदलना एक कठिन चुनौती है।
जनसंख्या नियंत्रण, प्रवासन, बसावट तथा मानव संसाधन विकास (HRD) के मोर्चे पर एक समग्र और बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है।
वोट-बैंक की राजनीति दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों के रास्ते में बाधा बनती है।
पीछे मुड़कर देखें तो जनसांख्यिकीय परिवर्तन का टाइम बम लगातार टिक-टिक कर रहा है और अंतिम उलटी गिनती की ओर बढ़ रहा है।
मूल चुनौती यह है कि भारत के जनसांख्यिकीय परिवर्तन को अस्थिरता का कारण बनने देने के बजाय उसे अवसर में बदला जाए।
इसके लिए एक समग्र रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें जनसंख्या प्रबंधन, अवैध प्रवासन की रोकथाम, तर्कसंगत पुनर्वास एवं बसावट नीतियाँ और बड़े पैमाने पर मानव संसाधन विकास शामिल हों।
जनसंख्या, संसाधनों और तकनीक के बीच बढ़ती असमानता को समय रहते संबोधित करना आवश्यक है, अन्यथा यह स्थिति भविष्य में नियंत्रण से बाहर हो सकती है।
भ्रष्टाचार : आंतरिक सुरक्षा की “पालक माता”
दूसरी बड़ी चुनौती है भ्रष्टाचार।
दुनिया का कोई भी समाज पूरी तरह भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं रहा है। इतिहास बताता है कि निरंकुश और लोकतांत्रिक—दोनों प्रकार की व्यवस्थाएँ भ्रष्टाचार से प्रभावित रही हैं।
लेकिन भारत में सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार की गहरी पैठ के विशेष रूप से गंभीर परिणाम सामने आए हैं।
भ्रष्टाचार संस्थाओं को कमजोर करता है, शासन व्यवस्था को विकृत करता है, योग्यता और मेरिट को नुकसान पहुँचाता है तथा ऐसी समानांतर व्यवस्था को जन्म देता है जिसमें कानून से अधिक प्रभाव और धन का महत्व हो जाता है।
जैसा कि मैंने अपनी वर्ष 2001 की पुस्तक में लिखा था, वास्तविक समस्या केवल भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि वह अवसर है जो भ्रष्टाचार उन लोगों को उपलब्ध कराता है जो सार्वजनिक पद का दुरुपयोग करने के लिए तैयार रहते हैं।
राजनीतिक नेता लगातार “भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस” की घोषणा करते हैं, लेकिन जहाँ संस्थाएँ कमजोर हैं, जवाबदेही में देरी होती है और राजनीतिक संरक्षण प्रभावशाली लोगों को बचाता है, वहाँ भ्रष्टाचार फलता-फूलता रहता है।
भ्रष्टाचार मानवीय और सामाजिक व्यवस्था का पुराना हिस्सा रहा है। इतिहास में कोई भी समाज पूरी तरह भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं रहा। लगभग सभी सभ्यताओं के सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार का प्रभाव रहा है।
रिश्वत देने वाला और रिश्वत लेने वाला—दोनों को ऐतिहासिक रूप से भ्रष्ट माना गया है। इस अर्थ में भ्रष्टाचार एक सहमति-आधारित अपराध भी बन जाता है।
मानव इतिहास से हमें महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं।
पहला, राजनीति—विशेषकर लोकतंत्र की जटिल चुनावी राजनीति—भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे सकती है।
दूसरा, भ्रष्टाचार एक संक्रामक बीमारी की तरह है।
इतिहास में भ्रष्टाचार ने कई महान साम्राज्यों और राष्ट्रों को भीतर से कमजोर और नष्ट किया है। इतिहास बताता है कि अधिनायकवादी और लोकतांत्रिक—दोनों व्यवस्थाएँ भ्रष्टाचार से प्रभावित हो सकती हैं।
पूरे इतिहास में शासकों ने सत्ता हासिल करने और उसे बनाए रखने के लिए भ्रष्ट एवं आपराधिक तरीकों का इस्तेमाल किया है।
भारत में भ्रष्टाचार की विरासत भी बहुत पुरानी है। कौटिल्य ने अपने समय में प्रचलित भ्रष्टाचार के विभिन्न तरीकों का विस्तृत विश्लेषण किया था।
भ्रष्टाचार के आंकड़े
आंकड़े बताते हैं कि समस्या समाप्त नहीं हुई है।
वर्ष 2013 में भारत ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के Corruption Perceptions Index में 177 देशों में 94वें स्थान पर था। भारत का स्कोर 100 में से 36 था, जहाँ 0 का अर्थ अत्यधिक भ्रष्ट और 100 का अर्थ अत्यंत स्वच्छ व्यवस्था है।
वर्ष 2025 में भारत 182 देशों में 91वें स्थान पर रहा। भारत का स्कोर 100 में से 39 रहा।
अर्थात रैंक और स्कोर में सुधार हुआ है, लेकिन यह सुधार अभी भी सीमित और मामूली है।
15 अगस्त 1997 को अपने संबोधन में तत्कालीन प्रधानमंत्री आई.के. गुजराल ने भ्रष्टाचार को जातिवाद और सांप्रदायिकता के साथ देश का प्रमुख शत्रु बताया था। उन्होंने रिश्वत लेने वालों को देश का गद्दार तक कहा था।
लगभग हर राजनीतिक नेता “भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस” की बात करता है, लेकिन बंद दरवाजों के पीछे भ्रष्टाचार फलता-फूलता रहता है।
भ्रष्टाचार भारतीय राज्य व्यवस्था को भीतर से कमजोर कर रहा है।
सभी संस्थाएँ और एजेंसियाँ भ्रष्टाचार के सर्वव्यापी विस्तार को रोकने में लगातार असफल रही हैं।
यह मूलतः पूरी व्यवस्था की विफलता (Total System Failure) है।
आगे का रास्ता
असहज लेकिन महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि लगातार सत्ता में रहे राजनीतिक प्रतिष्ठान भारत की आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों की “जननी” और “पालक माता”—जनसांख्यिकीय दबाव और भ्रष्टाचार—दोनों का पर्याप्त रूप से सामना करने में विफल रहे हैं।
जनसंख्या का दबाव बढ़ रहा है, संसाधन सीमित हैं और युवा तथा आकांक्षी समाज की अपेक्षाएँ तेजी से बढ़ रही हैं।
यह स्वीकार करना होगा कि 2014 के बाद निश्चित रूप से परिवर्तन आया है और हुई प्रगति से इनकार करना उचित नहीं होगा।
लेकिन केवल कानून बना देने से शासन व्यवस्था में परिवर्तन नहीं आता।
संस्थाओं और प्रवर्तन एजेंसियों को भ्रष्टाचार तथा सार्वजनिक व्यवस्था के अन्य खतरों से निपटने के लिए अधिक प्रभावी, स्वतंत्र और कठोर बनाना होगा।
भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है।
भारत में तकनीक की कमी नहीं है।
भारत में आकांक्षाओं की भी कमी नहीं है।
जिस चीज की आवश्यकता है, वह है—मजबूत संस्थागत क्षमता, राजनीतिक परिपक्वता और ऐसी दीर्घकालिक राष्ट्रीय रणनीति जो चुनावी गणनाओं से ऊपर उठकर काम करे।
अब समय आ गया है कि भारत की व्यवस्थाओं, संस्थाओं और प्रक्रियाओं का समग्र पुनर्गठन किया जाए।
भारत केवल संकट पैदा होने के बाद उसका प्रबंधन करने का जोखिम नहीं उठा सकता।
हमें संकटों का पूर्वानुमान लगाना होगा, उनकी मूल वजहों को पहचानना होगा और समय रहते कार्रवाई करनी होगी।
क्योंकि आज के चेतावनी संकेत यदि अनदेखे किए गए, तो वे कल की राष्ट्रीय सुरक्षा आपात स्थिति में बदल सकते हैं।
भारत के सामने चुनौती केवल वर्तमान संकटों को संभालने की नहीं है—बल्कि ऐसी मजबूत व्यवस्था बनाने की है जो भविष्य के संकटों को पैदा होने से पहले ही रोक सके।

0 टिप्पणियाँ
If you have any doubts, please let me know